हरपालपुर में आवारा कुत्तों का खौफ और 'बीमार' स्वास्थ्य व्यवस्था, आखिर कब तक लापरवाही की आग में झुलसेगी जनता?
हरपालपुर (छतरपुर) | बुंदेलखंड के प्रमुख व्यापारिक केंद्र हरपालपुर में इन दिनों सड़कों पर निकलना खतरे से खाली नहीं रह गया है। एक तरफ जहां आवारा कुत्तों के आतंक ने शहर की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। स्थिति यह है कि जनता अब कुत्तों के काटने से ज्यादा अस्पताल की अव्यवस्थाओं से डरने लगी है।
1. गलियों में 'श्वान राज': बच्चों और बुजुर्गों का निकलना दूभर
शहर की मुख्य सड़कों से लेकर रिहायशी कॉलोनियों तक में आवारा कुत्तों का जमावड़ा बढ़ गया है। पिछले कुछ हफ्तों में कई लोग इन कुत्तों का शिकार बन चुके हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये कुत्ते अब हिंसक हो चुके हैं और झुंड में हमला करते हैं। नगर परिषद की निष्क्रियता के कारण आवारा पशुओं की नसबंदी या उन्हें पकड़ने का कोई अभियान नहीं चलाया जा रहा, जिससे उनकी संख्या में अनियंत्रित बढ़ोतरी हो रही है।
2. पीएचसी की बदहाली: रेबीज के इंजेक्शन तक नसीब नहीं
नगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) की हालत 'सफेद हाथी' जैसी हो गई है। कुछ समय पहले तक यहां एंटी-रेबीज इंजेक्शन (ARV) उपलब्ध रहते थे, लेकिन अब अस्पताल प्रशासन हाथ खड़े कर देता है। गरीब मरीज जब जख्मी हालत में अस्पताल पहुंचता है, तो उसे बाहर से महंगा इंजेक्शन खरीदने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं का यह गिरता स्तर स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
3. भीतर की कहानी: स्टाफ की राजनीति और डॉक्टरों का पलायन
अस्पताल में डॉक्टरों के न रुकने की कहानी काफी पेचीदा है। सूत्रों के मुताबिक, यहां के कुछ पुराने स्टाफ और बाहर से आने वाले डॉक्टरों के बीच तालमेल की भारी कमी है।
अनुशासन का अभाव: चर्चा है कि कुछ कर्मचारी अपनी ड्यूटी के प्रति गंभीर नहीं हैं। कई बार ऐसी शिकायतें भी सामने आती हैं कि कर्मचारी स्वयं ड्यूटी से गायब रहकर अपनी जगह किसी निजी या बाहरी व्यक्ति को बैठा देते हैं। जब नए डॉक्टर इस कार्यप्रणाली को सुधारने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें असहयोग का सामना करना पड़ता है।
जनता का व्यवहार: मामले का दूसरा पहलू यह भी है कि डॉक्टरों के अनुसार स्थानीय जनता का व्यवहार भी संवेदनशील नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर अभद्रता और सुरक्षा की कमी के चलते डॉक्टर यहां अपनी सेवाएं देने से बच रहे हैं।
4. स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार और लापरवाही की सुगबुगाहट
दबी जुबान में यह भी आरोप लग रहे हैं कि अस्पताल का एक वर्ग जानबूझकर व्यवस्था को पटरी पर नहीं आने देना चाहता ताकि उनकी मनमानी चलती रहे। ड्यूटी से नदारद रहने वाले कर्मचारी 'सिस्टम' की खामियों का फायदा उठाकर मजा मार रहे हैं, जबकि असल परेशानी उस पीड़ित मरीज को उठानी पड़ती है जो मीलों दूर से इलाज की उम्मीद में आता है।
5. जिम्मेदार मौन, जनता बेहाल
महिला और पुरुष डॉक्टरों के बार-बार तबादले या इस्तीफे ने हरपालपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि प्रशासन केवल आंकड़ों की बाजीगरी कर रहा है, जबकि धरातल पर न तो कुत्तों से सुरक्षा मिल रही है और न ही जख्मों पर मरहम लगाने के लिए अस्पताल में डॉक्टर और दवाएं मौजूद हैं।
हमारा सवाल: क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग हरपालपुर के इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का औचक निरीक्षण कर लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई करेगा? और क्या नगर परिषद आवारा कुत्तों के इस बढ़ते आतंक से जनता को निजात दिला पाएगी?
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