महोबा: विश्वास का कत्ल और पांच साल का नारकीय कैद,

बुन्देली न्यूज़,
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महोबा: विश्वास का कत्ल और पांच साल का नारकीय कैद,

महोबा से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी और उनकी युवा बेटी को अपने ही घर में 'अपनों' (विश्वस्त नौकरों) ने जीते-जी नर्क दिखा दिया।
क्या है पूरा मामला?
रेलवे से 2015 में रिटायर हुए ओम प्रकाश राठौर अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बेटी रश्मि के साथ रहते थे। घर की देखभाल के लिए उन्होंने राम प्रकाश कुशवाहा और उसकी पत्नी रामदेवी पर भरोसा किया। लेकिन यह भरोसा उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
कब्जा और कैद: नौकरों ने चालाकी से पूरी संपत्ति पर नजर गड़ाई और पिता-पुत्री को अलग-अलग कमरों में कैद कर दिया।
5 साल का 'अदृश्य' वनवास: पिछले पांच वर्षों से बाहरी दुनिया के लिए ओम प्रकाश 'बाहर' गए थे, जबकि असल में वे अंदर भूख और प्रताड़ना सह रहे थे।
जिंदा कंकाल बनी बेटी: रश्मि, जिसकी उम्र मात्र 27 साल है, आज एक 80 साल की बुजुर्ग जैसी नजर आ रही है। 5 साल तक बिना धूप, बिना सही भोजन और बिना कपड़ों के अंधेरे कमरे में कैद रहने के कारण वह चलने-फिरने तक के लायक नहीं बची।
खौफनाक मंजर: ओम प्रकाश की मृत्यु के बाद जब सच्चाई सामने आई, तो पुलिस भी दंग रह गई। 27 साल की रश्मि, जो कभी स्वस्थ थी, भूख और अंधेरे कमरे में रहने के कारण हड्डियों का ढांचा बन चुकी है।
पुलिस की कार्रवाई
फिलहाल, आरोपी पति-पत्नी फरार हैं। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है और उनकी तलाश के लिए टीमें रवाना कर दी गई हैं। रश्मि को इलाज के लिए भर्ती कराया गया है, जहाँ उसकी हालत नाजुक बनी हुई है।
एक बड़ा सबक: अब किस पर करें विश्वास?
यह घटना हमें कुछ कड़वे सबक सिखाती है:
पड़ोसियों की भूमिका: क्या 5 साल तक आस-पास के लोगों को शक नहीं हुआ? सामाजिक मेल-जोल की कमी ऐसे अपराधियों को साहस देती है।
घरेलू सहायकों का सत्यापन: किसी को भी घर में रखने से पहले पुलिस वेरिफिकेशन और उनकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखना अनिवार्य है।
रिश्तेदारों से संपर्क: अकेले रहने वाले बुजुर्गों को अपने रिश्तेदारों या पुराने मित्रों से नियमित संवाद बनाए रखना चाहिए।
समाज के लिए कुछ कड़वे सवाल
यह खबर हमें आइना दिखाती है और पूछती है:
कहाँ गया हमारा पड़ोस? क्या पांच सालों में एक बार भी किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि ओम प्रकाश जी वास्तव में कहाँ हैं?
नौकरों का बढ़ता दुस्साहस: क्या हम आंख मूंदकर किसी पर भरोसा कर रहे हैं?
नोट: इस घटना ने साबित कर दिया है कि कभी-कभी बंद दरवाजों के पीछे जो होता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सतर्कता ही एकमात्र बचाव है।

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