सलाखों के पीछे पनपा प्यार, मंदिर में मिली मंजिल: सहायक जेल अधीक्षक फिरोजा और धर्मेंद्र की अनूठी प्रेम कहानी,

सलाखों के पीछे पनपा प्यार, मंदिर में मिली मंजिल: सहायक जेल अधीक्षक फिरोजा और धर्मेंद्र की अनूठी प्रेम कहानी,

बुन्देली न्यूज़,
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सलाखों के पीछे पनपा प्यार, मंदिर में मिली मंजिल: सहायक जेल अधीक्षक फिरोजा और धर्मेंद्र की अनूठी प्रेम कहानी,
​छतरपुर (मध्य प्रदेश): कहते हैं कि प्यार न सरहदें देखता है, न मजहब और न ही अतीत के दाग। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के लवकुशनगर में एक ऐसी ही शादी संपन्न हुई, जिसने न केवल सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि हृदय परिवर्तन और प्रायश्चित किसी भी इंसान का नया जीवन शुरू कर सकते हैं।
​1. जहाँ सजा खत्म हुई, वहीं से शुरू हुआ 'सफर'
​इस कहानी की शुरुआत आज से कई साल पहले सतना केंद्रीय जेल की ऊँची दीवारों के बीच हुई थी। धर्मेंद्र सिंह, जिन्हें 2007 के एक हत्या मामले में उम्रकैद की सजा हुई थी, जेल में अपनी सजा काट रहे थे। उसी दौरान वहाँ सहायक जेल अधीक्षक (Assistant Jail Superintendent) के पद पर तैनात थीं फिरोजा खातून।
​जेल प्रशासन के कामकाज के दौरान धर्मेंद्र, जो वारंट संबंधी कार्यों में मदद करते थे, फिरोजा के संपर्क में आए। फिरोजा ने धर्मेंद्र के भीतर एक ऐसे इंसान को देखा जो अपने किए पर शर्मिंदा था और सुधार की राह पर था। अनुशासन और ड्यूटी के बीच पनपा यह सम्मान धीरे-धीरे गहरे प्रेम में बदल गया।
​2. वर्दी और कलंक के बीच का संघर्ष
​एक तरफ खाकी वर्दी की गरिमा थी और दूसरी तरफ एक ऐसा व्यक्ति जिसे समाज 'अपराधी' मानता था। लेकिन फिरोजा का मानना था कि 14 साल की लंबी सजा काटने के बाद धर्मेंद्र अब वह व्यक्ति नहीं रहे जो जेल आए थे।
​धर्मेंद्र की रिहाई: लगभग 4 साल पहले जब धर्मेंद्र जेल से रिहा हुए, तब भी दोनों का संपर्क बना रहा।
​विरोध का सामना: जब शादी की बात आई, तो फिरोजा को अपने ही परिवार के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। अपनों ने साथ छोड़ दिया, लेकिन फिरोजा अपने फैसले पर अडिग रहीं।
​3. बजरंग दल ने निभाया 'भाई' और 'पिता' का फर्ज
​जब अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तब एक अप्रत्याशित मोड़ आया। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को जब इस प्रेम कहानी और फिरोजा के अडिग विश्वास का पता चला, तो उन्होंने आगे बढ़कर मदद का हाथ बढ़ाया।
​"मोहब्बत का कोई मजहब नहीं होता और जब बात एक सुधर चुके व्यक्ति को नया जीवन देने की हो, तो हम पीछे नहीं हट सकते।"
​लवकुशनगर के एक मैरिज गार्डन में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह का आयोजन हुआ। यहाँ बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने फिरोजा का कन्यादान किया और भाई बनकर शादी की तमाम रस्में निभाईं।
​4. वैदिक मंत्रोच्चार और 'सात फेरे'
​बुधवार को यह विवाह पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। मुस्लिम समुदाय से आने वाली फिरोजा ने हिंदू रीति-रिवाज को अपनाते हुए अग्नि के सात फेरे लिए। लाल जोड़े में सजी फिरोजा और दूल्हे बने धर्मेंद्र को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। यह सिर्फ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि:
​गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण था।
​अपराध से घृणा, अपराधी से नहीं के सिद्धांत की जीत थी।
​समाज की संकीर्ण सोच पर एक करारा प्रहार था।
​5. बुंदेलखंड में चर्चा का विषय
​आज पूरे बुंदेलखंड में इस शादी की चर्चा है। लोग इसे एक 'सकारात्मक बदलाव' के रूप में देख रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि जेलों का मुख्य उद्देश्य अपराधी का सुधार (Rehabilitation) होता है, और फिरोजा ने धर्मेंद्र को अपनाकर उस सुधार को पूर्णता प्रदान की है।
​निष्कर्ष: फिरोजा और धर्मेंद्र की यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान का अतीत चाहे जैसा भी हो, यदि उसका वर्तमान सुधरा हुआ है और नीयत साफ है, तो उसे समाज में सिर उठाकर जीने का पूरा हक है। यह विवाह नफरत के दौर में मोहब्बत और विश्वास का एक नया पैगाम दे गया है।

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