#सावधान अभिभावक! हरपालपुर के स्कूलों में एडमिशन से पहले 'हाथी के दांत' परखना जरूरी,

#सावधान अभिभावक! हरपालपुर के स्कूलों में एडमिशन से पहले 'हाथी के दांत' परखना जरूरी,

बुन्देली न्यूज़,
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​सावधान अभिभावक! हरपालपुर के स्कूलों में एडमिशन से पहले 'हाथी के दांत' परखना जरूरी, कहीं आप भी तो नहीं हो रहे ठगी के शिकार?

​हरपालपुर। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही क्षेत्र में निजी स्कूलों की चकाचौंध और प्रचार-प्रसार का बाजार गर्म हो चुका है। माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अच्छे स्कूलों की तलाश में भटक रहे हैं। लेकिन, हरपालपुर के शिक्षा जगत से जो जमीनी हकीकत सामने आ रही है, वह बेहद चौंकाने वाली है। अक्सर देखा जाता है कि कई निजी शिक्षण संस्थानों की हकीकत "हाथी के दांत, खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और" जैसी है।

​अभिभावकों को केवल चमचमाती इमारतें और लुभावने विज्ञापन देखकर बच्चों का एडमिशन कराने से बचना होगा। दाखिला दिलाने से पहले कुछ बेहद महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बारीकी से ध्यान देने की जरूरत है:

​1. शुरुआती दिनों में 'विदेशी' शिक्षक, बाद में मिलते हैं 'अनाड़ी'

​हरपालपुर के कई विद्यालयों में एक बड़ा खेल देखने को मिलता है। जब माता-पिता एडमिशन करवाने जाते हैं, तो उन्हें बेहद योग्य, स्वच्छ छवि और ऊंचे डिग्रीधारी शिक्षक दिखाए जाते हैं। शुरुआती दिनों में तो सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन योग्य शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया जाता है या वे खुद कम सैलरी के कारण स्कूल छोड़ देते हैं। उनकी जगह कम पढ़े-लिखें और अप्रशिक्षित लोगों को रख लिया जाता है, जिससे बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है। अभिभावक एडमिशन से पहले यह जरूर सुनिश्चित करें कि जो शिक्षक आज दिख रहे हैं, क्या वे पूरे साल रहेंगे?

​2. स्कूल के आस-पास का वातावरण कैसा है?

​अभिभावक इस बात पर विशेष ध्यान दें कि स्कूल जिस जगह खुला है, उसके आस-पास का माहौल कैसा है। क्या वह क्षेत्र शांत और सुरक्षित है? कहीं स्कूल के पास असामाजिक तत्वों का जमावड़ा, शराब की दुकानें या ऐसा कोई व्यवसाय तो नहीं चल रहा जिससे बच्चों के कोमल मन पर बुरा असर पड़े? स्कूल का अंदरूनी और बाहरी वातावरण बच्चों की मानसिक ग्रोथ के लिए सबसे अहम है।

​3. संचालक की छवि कैसी है?

​स्कूल खोलकर बैठे संचालक की सामाजिक और नैतिक छवि किस प्रकार की है, इसकी पड़ताल करना बेहद जरूरी है। क्या संचालक का उद्देश्य केवल शिक्षा को व्यापार बनाकर पैसा कमाना है, या वह वास्तव में बच्चों के भविष्य के प्रति गंभीर है? एक बेदाग और अनुशासित छवि वाले संचालक का स्कूल ही बच्चों को सही संस्कार दे सकता है।

​4. कौन सा पाठ्यक्रम (Syllabus) हो रहा है लागू?

​कई स्कूल बोर्ड की किताबों के नाम पर निजी प्रकाशकों (Private Publishers) की महंगी किताबें थमा देते हैं, जिनका स्तर बच्चों के मानसिक स्तर के अनुकूल नहीं होता। अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन से साफ पूछना चाहिए कि वे कौन सा पाठ्यक्रम लागू कर रहे हैं और क्या वह मान्यता प्राप्त बोर्ड के नियमों के तहत है या नहीं?

​5. बच्चों के वाहन किस टाइप के हैं और उनकी क्वालिटी कैसी है?

​बच्चों की सुरक्षा सबसे सर्वोपरि है। एडमिशन के समय स्कूल प्रबंधन से यह जरूर पूछें कि बच्चों को लाने-ले जाने के लिए किस टाइप के वाहनों (बस, वैन, या ऑटो) का इस्तेमाल किया जा रहा है? उन वाहनों की क्वालिटी और फिटनेस कैसी है? अक्सर देखा जाता है कि कागजों पर और शुरुआती दिनों में अच्छी गाड़ियां दिखाई जाती हैं, लेकिन बाद में जर्जर, खटारा और बिना फिटनेस वाली गाड़ियों में बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह ठूस दिया जाता है। वाहनों में सीसीटीवी कैमरे, जीपीएस और जिम्मेदार कंडक्टर हैं या नहीं, इसकी जांच अभिभावक खुद करें।

​6. स्कूल आते-जाते समय के रास्ते और उसमें आने वाली दिक्कतें

​घर से स्कूल तक का सफर कितना सुरक्षित है, इस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। स्कूल आते-जाते समय रास्ते किस प्रकार के हैं? क्या रास्ते में भारी ट्रैफिक, गहरे गड्ढे, संकरी गलियां या रेलवे क्रॉसिंग जैसी दिक्कतें आती हैं? बरसात के दिनों में क्या उन रास्तों पर जलभराव या कीचड़ की समस्या होती है? अगर रास्ते जोखिम भरे हैं, तो स्कूल प्रशासन के पास बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या वैकल्पिक इंतजाम या इमरजेंसी प्लान है, इस पर पहले ही बात कर लें।

​7. सबसे अहम बात: अनुशासन का स्तर क्या है?

​शिक्षा के साथ-साथ बच्चों में अनुशासन और अच्छे संस्कार डालना स्कूल की पहली जिम्मेदारी है। आज के समय में स्कूलों में केवल किताबी कीड़ा बनाया जा रहा है, लेकिन अनुशासन गायब है। एडमिशन से पहले पुराने पढ़ रहे बच्चों के अभिभावकों से फीडबैक लें कि स्कूल में अनुशासन और बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रबंधन कितना गंभीर है।

​'बुंदेली न्यूज़' की अपील:

बच्चों का भविष्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं है। हरपालपुर के सभी माता-पिता से अपील है कि भारी-भरकम फीस चुकाने से पहले स्कूल की चकाचौंध के पीछे छिपी सच्चाई को खुद जाकर परखें। विज्ञापनों के जाल में न फंसें, बल्कि धरातल पर जाकर शिक्षकों की योग्यता, स्कूल के माहौल, रास्तों की सुगमता और परिवहन सुरक्षा की बारीकी से जांच करें।


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