कौन था हरीश राणा? (निजी और शैक्षिक पृष्ठभूमि)
हरीश राणा दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था। हादसे से पहले वह एक ऊर्जावान और सपनों से भरा युवक था:
शिक्षा और करियर: हरीश ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बी.कॉम (B.Com) किया था। वह अपने करियर को लेकर काफी गंभीर था और भविष्य में एक अच्छी नौकरी कर अपने बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनना चाहता था।
कामकाज: हादसे के समय वह काम की तलाश में था और कुछ छोटे-मोटे प्रोजेक्ट्स से जुड़ा हुआ था। वह अपने परिवार का इकलौता बेटा है, जिससे उसके माता-पिता को बहुत उम्मीदें थीं।
स्वभाव: पारिवारिक सूत्रों और पड़ोसियों के अनुसार, हरीश एक मिलनसार और शांत स्वभाव का लड़का था। उसे पढ़ने-लिखने और अपने दोस्तों के साथ समय बिताने का शौक था।
वह काला दिन: 2013 की दुर्घटना
हरीश की जिंदगी 2013 में एक पल में बदल गई। वह अपने घर की चौथी मंजिल की छत पर था, जहाँ से पैर फिसलने के कारण वह सीधे नीचे गिर गया।
इस गिरने से उसके सिर (Brain Injury) और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं।
डॉक्टरों ने कई ऑपरेशन किए, लेकिन दिमाग की नसों में आई गहरी चोट के कारण वह 'पर्सीस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चला गया।
PVS का मतलब है कि इंसान की आंखें तो खुलती हैं, वह सोता और जागता भी है, लेकिन उसे अपने आसपास के माहौल का कोई अहसास नहीं होता। वह न कुछ समझ सकता है और न ही प्रतिक्रिया दे सकता है।
खबर के लिए विशेष अंश (Addition for News):
"बी.कॉम की डिग्री हाथ में लेकर सुनहरे भविष्य के सपने बुनने वाला हरीश, आज 11 सालों से एक कमरे की चारदीवारी में कैद है। जिस उम्र में उसे अपने पिता की लाठी बनना था, उस उम्र में 80 साल के बुजुर्ग पिता और 72 साल की बीमार मां को उसे गोद में उठाकर नहलाना-धुलाना पड़ता है। शिक्षा और योग्यता धरी की धरी रह गई, और पीछे छूट गई तो बस एक अंतहीन प्रतीक्षा—या तो ठीक होने की, या फिर सम्मानजनक विदाई की।"
नई दिल्ली: न्याय और जीवन के अधिकार के बीच फंसी एक ऐसी कहानी, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी है 36 वर्षीय हरीश राणा की, जो पिछले 11 वर्षों से एक 'जिंदा लाश' की तरह बिस्तर पर पड़े हैं, और उनके बुजुर्ग माता-पिता की, जो अब अपने बेटे के लिए 'इच्छा मृत्यु' (Euthanasia) की मांग कर रहे हैं।
एक दुर्घटना और थम गई जिंदगी
हरीश राणा की जिंदगी साल 2013 में पूरी तरह बदल गई। एक दुखद हादसे में हरीश चौथी मंजिल की छत से नीचे गिर गए थे। इस दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में इतनी गंभीर चोटें आईं कि वे 'पर्सीस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (Pervasive Vegetative State) में चले गए। तब से लेकर आज तक, हरीश न बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही अपनी कोई जरूरत बता सकते हैं। वे पूरी तरह से एक फीडिंग ट्यूब (भोजन नली) और अपने माता-पिता की सेवा पर निर्भर हैं।
बुजुर्ग माता-पिता की बेबसी
हरीश के पिता (80 वर्ष) और माता (72 वर्ष) ने पिछले एक दशक से अपने बेटे की दिन-रात सेवा की है। लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव पर उनकी हिम्मत जवाब दे रही है। कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में उन्होंने कहा:
आर्थिक तंगी: बेटे के इलाज और देखभाल में जमापूंजी खत्म हो चुकी है।
शारीरिक असमर्थता: बढ़ती उम्र के कारण अब वे अपने बेटे को बिस्तर से हिलाने या नहलाने-धुलाने में भी असमर्थ हैं।
भविष्य की चिंता: माता-पिता का सबसे बड़ा डर यह है कि "हमारे बाद हमारे बेटे का क्या होगा? उसे कौन संभालेगा?"
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला और कानूनी पेच
हाल ही में यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा, जहाँ परिवार ने हरीश के लिए 'पैसिव यूथेनेशिया' की अनुमति मांगी। हालांकि, अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
लाइफ सपोर्ट का अभाव: मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, हरीश वेंटिलेटर या किसी कृत्रिम मशीन के सहारे नहीं जी रहे हैं। वे प्राकृतिक रूप से सांस ले रहे हैं।
कानूनी सीमा: भारत के कानून के अनुसार, 'पैसिव यूथेनेशिया' की अनुमति केवल तब दी जा सकती है जब मरीज को जीवित रखने के लिए मशीन (Life Support) की जरूरत हो। हरीश के मामले में फीडिंग ट्यूब हटाना 'इच्छा मृत्यु' नहीं बल्कि 'भूखा मारकर हत्या' की श्रेणी में माना जाएगा।
संविधान का अनुच्छेद 21: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'जीने के अधिकार' में 'मरने का अधिकार' शामिल नहीं है, जब तक कि स्थिति पूरी तरह लाइलाज और मशीन पर टिकी न हो।
क्या है आगे का रास्ता?
कोर्ट ने परिवार की स्थिति पर सहानुभूति जताते हुए केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वे देखें कि क्या हरीश को किसी सरकारी होम-केयर या मेडिकल सहायता सुविधा में स्थानांतरित किया जा सकता है।
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